जानिए 14 अगस्त 1947 की रात का दर्दनाक किस्सा!

14-15 अगस्त की रात नेहरू को एक फोन आया और वे चिंता में डूब गए
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14 अगस्त
आजादी पाने की खुशी दिल्ली में तो दिखाई दे रही थी लेकिन लाहौर और कलकत्ता में हो रहे सांप्रदायिक दंगों के चलते राष्ट्रपति महात्मा गांधी खुश नहीं थे। इस चिंता में उन्होंने आजादी के जश्न में भी शामिल होने से इनकार कर दिया था।स्थिति काफी बिगड़ चुकी थी। पूरा लाहौर शहर धू-धू कर जल रहा था। फोन पर मिली जानकारी के कुछ घंटे बाद ही नेहरू को भारत की आजादी पर भाषण देना था। लेकिन उनके मन में लाहौर की चिंता थी। बेहद धीमे स्वर में नेहरू ने कहा- ‘आज रात मैं क्या बोलूंगा, क्या कहूंगा, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा, कैसे खुश होने का ढोंग रचूंगा कि आजादी पाने की खुशी मेरे दिल में नहीं समा रही।’ जबकि लाहौर में कत्लेआम मचा है।

दिल्ली. 15 अगस्‍त 1947 को भारत आजाद हुआ था। इसके एक दिन पहले की रात 14 अगस्त की उस आधी रात को हिन्‍दुस्‍तान में जो हुआ उसने देश के इतिहास और भूगोल को बदल कर रख दिया। 68 साल पहले हम अंग्रेजों की 250 वर्षो की गुलामी से आजाद तो हो गए, लेकिन जाते-जाते वह हमें बंटवारे का दर्द दे गए। 14 अगस्त की रात हिन्‍दुस्‍तान के 2 टुकड़े हुए थे जिससे लाखों लोग बेघर हो गए। एक तरफ भारत तो दूसरी तरफ पाकिस्तान बना। बंटवारे के दौरान चारों तरफ हिंसा फैली हुई थी। लोग जिनके साथ उठते-बैठते थे, वे अपनों के ही दुश्मन बन बैठे। 15 अगस्त 1947 को देश को अंग्रेजों की गुलामी से स्वतंत्रता मिली।14 अगस्त

14-15 अगस्त की रात दिल्ली में नई सुबह के स्वागत की तैयारियां हो रही थीं। पंडित जवाहर लाल नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बनने वाले थे। लेकिन इस रात नेहरू को लाहौर से एक फोन आया। लाहौर उस वक्त पाकिस्तान का हिस्सा हो चुका था। इस फोन के बाद से जवाहर लाल नेहरु के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई।फोन पर बात करने के बाद नेहरू बेहद घबराए हुए थे। दरअसल पाकिस्तान में आजादी(15 अगस्त 1947) की रात से ही गैर मुस्लिमों के साथ खूनी खेल शुरू हो गया था। लाहौर में हिंदू और सिखों को निशाना बनाया जा रहा था। नेहरू को फोन कॉल से इसकी जानकारी दी गई तो उनके होश उड़ गये और मुंह से एक शब्द तक नहीं निकल रहा था।

नेहरू परेशानी में थे, क्योंकि लाहौर के नए प्रशासन ने वहां के हिंदू और सिख इलाकों में पानी की सप्लाई बंद कर दी थी। प्यास से तड़प रहे लोग पानी की तलाश में बाहर निकलते, तो उन्हें मुसलमानों द्वारा निशाना बनाया जाता।स्थिति काफी बिगड़ चुकी थी। पूरा लाहौर शहर धू-धू कर जल रहा था। फोन पर मिली जानकारी के कुछ घंटे बाद ही नेहरू को भारत की आजादी पर भाषण देना था। लेकिन उनके मन में लाहौर की चिंता थी। बेहद धीमे स्वर में नेहरू ने कहा- ‘आज रात मैं क्या बोलूंगा, क्या कहूंगा, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा, कैसे खुश होने का ढोंग रचूंगा कि आजादी पाने की खुशी मेरे दिल में नहीं समा रही।’ जबकि लाहौर में कत्लेआम मचा है।दरअसल फोन पर लाहौर की खबर से नेहरू का मन असहज हो उठा था।

आजादी के मौके पर उन्हें देश के नाम अपना भाषण तैयार करना था लेकिन उन्होंने कोई तैयारी नहीं की थी। दैनिक भास्कर में वैभव पलनीटकर ने लिखा कि नेहरू अपने भाषण में अपने मन की बात कहना चाहते थे लेकिन उस वक्त उनके मन में लाहौर में रह रहे हिंदू और सिखों की चिंता समाई थी।अपनी किताब फ्रीडम एट मिडनाइट में लैरी कॉलिन्स ने लिखा है, “अपने संबोधन के बाद नेहरी ने अपनी बहन को बताया कि भाषण देने के वक्त मुझे होश ही नहीं था कि मैं क्या कह रहा हूं। मेरी जुबान पर शब्द आते जा रहे थे और फिसलते जा रहे थे। लेकिन मेरे दिमाग में लाहौर की आग लगी हुई थी।”

बता दें कि आजादी पाने की खुशी दिल्ली में तो दिखाई दे रही थी लेकिन लाहौर और कलकत्ता में हो रहे सांप्रदायिक दंगों के चलते राष्ट्रपति महात्मा गांधी खुश नहीं थे। इस चिंता में उन्होंने आजादी के जश्न में भी शामिल होने से इनकार कर दिया था।

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