आजादी की जंग मे पुरानी दिल्ली की मिठाई की दुकानों का रोल! ज़रूर पढ़ें

आजादी की जंग में पुरानी दिल्ली की मिठाई की दुकानों का भी अहम योगदान था
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मिठाई शॉप
पुरानी दिल्ली की मिठाई की दुकानों का भी आज़दी  की जंग में अहम योगदान था। मिठाइयों के डिब्बे से स्वतंत्रता सेनानियों के लिए कोड का इस्तेमाल किया जाता था। ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ प्रत्येक मिठाई या तो बम हमले, आंदोलन या स्लीपर क्रांतिकारियों को कार्यवाही के लिए तैयार रहने के लिए एक संदेश देने के रूप में किया जाता था। कुछ मिठाई की दुकानें तो युवा क्रांतिकारियों के लिए ठिकाना बन गईं थीं।

दिल्ली.  15 अगस्त के अवसर पर सभी देश के आजादी के किस्सों को याद कर रहे है। आपके लिए लेकर आए है एक ऐसा ही रोचक किस्सा की किस तरह से पुरानी दिल्ली की मिठाई की दुकानों ने जंगे आजादी में अपनी भूमिका निभाई। मशहूर फूड एंथ्रोपोलॉजिस्ट और शेफ सब्यसाची गोराई ने मीडिया को बताया, “दुर्भाग्य से ये कहानियाँ हमारे मौखिक इतिहास में चली गई हैं और किसी ने भी इन्हें एक साथ संकलित नहीं किया है। लेकिन हमारे स्वतंत्रता सेनानी केवल फ्रांसीसी क्रांतिकारियों द्वारा अपनाई जाने वाली रणनीति का पालन कर रहे थे। आजादी के समय मिठाइयों का आदान-प्रदान संचार का एक भूमिगत तरीका बन गया था। 

उस समय कुछ मिठाई की दुकानों पर युवा क्रांतिकारी बैठकर रणनीति बनाते थे। साथ ही लड्डू के डिब्बे का मतलब होता था कि बम उतर रहे हैं। वहीं बंगाल के रसगुल्ले के डिब्बे का मतलब विस्फोटकों की एक बड़ी खेप से था। बर्फी का मतलब कारतूस और गोला-बारूद रास्ते में है, इससे था।

आजादी की जंग में पुरानी दिल्ली की मिठाई की दुकानों का भी अहम योगदान था। मिठाइयों के डिब्बे से स्वतंत्रता सेनानियों के लिए कोड का इस्तेमाल किया जाता था। ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ प्रत्येक मिठाई या तो बम हमले, आंदोलन या स्लीपर क्रांतिकारियों को कार्यवाही के लिए तैयार रहने के लिए एक संदेश देने के रूप में किया जाता था। कुछ मिठाई की दुकानें तो युवा क्रांतिकारियों के लिए ठिकाना बन गईं थीं।

शेफ सब्यसाची गोराई ने बताया, “मिठाइयों की दुकानों पर बमुश्किल ही छापा मारा जाता था। स्वतंत्रता सेनानियों के मिलने और संदेशों को देने का काम मिठाइयों की दुकानों से और मिठाइयों से ही होता था। चूंकि अंग्रेजों ने सार्वजनिक समारोहों पर प्रतिबंध लगा दिया था, मिठाई की दुकानों के आसपास की चर्चा ने स्वतंत्रता सेनानियों को आसानी से घुलने-मिलने में मदद की। कई जगहों पर उल्लेख है कि कैसे चंद्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह रात में कुल्हड़ चाय के लिए मटिया महल के चारों ओर घूमते थे और पुरी-आलू और हलवा के लिए घंटेवाला जाते थे। बेशक, वह दुकान अब बंद हो गई है।”

श्याम स्वीट्स जो 1910 में चावड़ी बाजार में इंपीरियल कैपिटल के साथ आया था, उस समय से गुजरा है। इसकी छठी पीढ़ी के वंशज 31 वर्षीय भारत अग्रवाल ने कहा, “राज के साथ नए व्यवसाय और ठेकेदार आए। बहुत सारे मारवाड़ी व्यवसायी तब इन भागों में बस गए और घेवर (बेसन, घी, दूध से बनी डिस्क के आकार की मिठाई और चाशनी में भिगोकर) प्राप्त की। हमारी दुकान पर स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में कुछ भी दर्ज नहीं है, लेकिन हां उच्च कैलोरी वाली मिठाई की परंपरा रही है जो लंबे समय तक चल सकती है। अक्सर घेवरों को खाने से ठीक पहले चाशनी में डुबोया जाता था ताकि इसे अधिक समय तक संरक्षित किया जा सके।”

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