बेलगाम विकास पहाड़ों को बना रहा है जानलेवा, जानिए!

29 जून से लेकर 1 अगस्त तक प्रदेश में 155 मौत हो चुकी हैं।
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हादसा
पहाड़ों में इस साल 29 जून से लेकर 1 अगस्त तक प्रदेश में 155 मौत हो चुकी हैं। इनमें सोमवार को ऊना के बंगाणा के समीप गोबिंद सागर झील में एक साथ पंजाब के मोहाली के सात युवकों के डूबने से हुई मौतें भी शामिल हैं। एक महीने में सडक दुर्घटनाओं से लेकर ल्हासों की चपेट में आने और सडक दुर्घटनाओं में मौतों का यह आंकडा दर्दनाक तो है ही लेकिन यह रुकेगा इस बावत कहीं कोई उम्मीद की किरण दिखाई नहीं दे रही हैं। लाहुल स्पिति और किन्नौर में जरूर पनबिजली परिरयोजनाओं के खिलाफ लोगों की आवाजें उठती सुनाई दे रही हैं,

शिमला.  सरकारी आंकडों के मुताबिक सोमवार शाम तक हिमाचल प्रदेश में महज एक महीने में 155 मौत हो चुकी हैं। इनमें से जिला ऊना व जिला शिमला में 22- 22 मौत हो चुकी हैं जबकि कुल्लू में 21, मंडी व चंबा में 17-17,सिरमौर व कांगडा में 12-12, सोलन में 9, हमीरपुर में 8, बिलासपुर व लाहुल स्पिति में 6-6 जबकि किन्नौर में तीन मौत हो चुकी हैं। इन में से 77 मौत केवल सडक हादसों में ही हुई हैं। एक की मौत बिजली गिरने से हुई । भूस्खलन व बाढ की चपेट में आने से दो-दो मौत हुई हैं। 16 मौत प्रदेश में उफान पर नदी नालों और झीलों में डूबने या बहने से हो गई हैं। करंट की चपेट में आने से 9 जबकि सांप के काटने से 15 और ढांक से गिरने से 21 लोगों की मौत हुई हैं।हादसा

लाहुल स्पिति हो या बारिश में भरभरा कर गिरने वाला कबाइली जिला किन्नौर के पहाड़ या फिर कुल्लू व अन्य जिलों के चटटानी पहाड, भरी बरसात में कुछ दशकों से दरकने लगे हैं। पहाडों के दरकने के दृश्य पिछले साल भी दिखाई दिए थे । ये दिल दहलाने वाले थे। यह सिलसिला इस साल भी जारी है। विकास के नाम पर जिस तरह से तबाही का खेल खेला जा रहा है, वह भी रुकने का नाम नहीं ले रहा है। इससे न तो कारोबारियों को और न ही सरकारों को कहीं कोई फर्क पड रहा हैं। फर्क केवल उनको पडता है जिनके घरों के चिराग बुझ जाते हैं।

आलम यह है कि इस साल 29 जून से लेकर 1 अगस्त तक प्रदेश में 155 मौत हो चुकी हैं। इनमें सोमवार को ऊना के बंगाणा के समीप गोबिंद सागर झील में एक साथ पंजाब के मोहाली के सात युवकों के डूबने से हुई मौतें भी शामिल हैं। एक महीने में सडक दुर्घटनाओं से लेकर ल्हासों की चपेट में आने और सडक दुर्घटनाओं में मौतों का यह आंकडा दर्दनाक तो है ही लेकिन यह रुकेगा इस बावत कहीं कोई उम्मीद की किरण दिखाई नहीं दे रही हैं। लाहुल स्पिति और किन्नौर में जरूर पनबिजली परिरयोजनाओं के खिलाफ लोगों की आवाजें उठती सुनाई दे रही हैं, लेकिन बाकी जगह कुछ दिनों के चीत्कार व मातम के बाद सब खामोश हो जाता है। इसके लिए सरकार भी महज आंकडों की बाजीगरी के अलावा कहीं कुछ नहीं कर रही हैं।

अभी मानसून के दो और महीने बचे हुए हैं। हालांकि 15 में मानसून के कम होने के आसार हो जाते हैं । मानसून में जानी नुकसान के अलावा बाकी भी कम नुकसान नहीं हुआ हैं। एक महीने में 240 लोग जख्मी हुए हैं। छह लोग अभी भी लापता हैं। इनमें से पांच लोग कुल्लू में आई बाढ में बह कर चले गए थे। उनके शवों को आज तक नहीं निकाला जा सका हैं जबकि एक व्यक्ति चंबा में बह गया था।

यही नहीं 104 मवेशी भी मरे हैं जबकि 25 पक्के मकान,50 कच्चे मकान बरसात की भेंट चढ चुके हैं। इसके अलावा 50 पक्के मकान और 163 कच्चे मकान आंशिक तौर पर ढह गए हैं। 32 दुकानें , सात पुल 218 गौशालाएभारी बारिश से तबाह हो चुके हैं।

यह नुकसान यूं ही होता रहेगा जब तक विकास की पटकथा में सुरक्षा के पैंबंदों को मजबूती से सिल नहीं दिया जाता। पर यह संभव हो पाएगा इसमें शंका है। क्योंकि विश्व बैंक और एशियन विकास बैंक की परियोजनाएं बडीझ्रबडी रकमों के बूते पर पहाडों को तबाह करने को आतुर जो हैं। 

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